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आजादी के जिस सिपाही की रिहाई बापू के सपने से हुई, उसे मौजूदा दौर ने भुला दिया

आजादी के जिस सिपाही की रिहाई बापू के सपने से हुई, उसे मौजूदा दौर ने भुला दिया

भिलाई. स्वतंत्रता आंदोलन के एक सिपाही ऐसे भी हुए हैं, जिनकी रिहाई की वजह ‘बापू का सपना’ बना। गुंडरदेही क्षेत्र में अमीन पटवारी की अंग्रेजों की नौकरी छोड़ कर स्वतंत्रता आंदोलन में कई बार जेल यात्रा करने वाले और बालोद क्षेत्र के कई स्वतंत्रता सेनानियों की प्रेरणा के स्त्रोत रहे वली मुहम्मद की गाथाएं आज भी बिखरी हुई हैं। आजादी के बाद से अब तक बापू के इस सिपाही की याद को अक्षुण्ण बनाए रखने अब तक कोई ठोस पहल नहीं हुई है। स्व. वली मुहम्मद के वंशजों को भी इस बात का मलाल है कि अब तक सरकारी स्तर पर कोई ठोस कोशिश नहीं हुई।

अंग्रेजों के वफादार पटवारी का महात्मा गांधी के प्रति रुझान होना भी अपने आप में एक अनूठी घटना थी। ऐसी घटनाओं का जिक्र जिला कांग्रेस कमेटी दुर्ग के तत्कालीन महामंत्री बदरुद्दीन कुरैशी के संपादन में 1995 में निकाली गई किताब ‘आजादी के दीवाने’ और फरवरी 2020 में जगदीश देशमुख द्वारा लिखित छत्तीसगढ़ के ‘भूले बिसरे स्वतंत्रता सेनानी’ में विस्तार से है। जिसे छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता सेनानियों की गाथाओं पर प्रकाशित कई किताबों में दर्ज किया गया है।

जिसके मुताबिक 1920-21 में जब वली मुहम्मद पटवारी के तौर पर गुंडरदेही के गोरकापार में पदस्थ थे, तब एक आदिवासी को उसकी गुम भैंस का पता किसी धोती वाले बूढ़े ने बताया था। जब आदिवासी उस बूढ़े को धन्यवाद देने खोजने लगा, तब वली मुहम्मद ने उसके बताए हुलिए के आधार पर महात्मा गांधी का फोटो दिखाया। आदिवासी ने उस बूढ़े के तौर पर महात्मा गांधी की शिनाख्त कर दी और इस घटना से वली मुहम्मद इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अंग्रेजों की नौकरी छोड़ दी और महात्मा गांधी उनके नेता हो गए। स्वतंत्रता सेनानी वली मुहम्मद की पहली जेलयात्रा और वहां से रिहाई का एक रोचक किस्सा भी इन किताबों में दर्ज है, जिसके मुताबिक असहयोग आंदोलन के दौर में उन्हें नागपुर जेल में रखा गया था।

इस दौरान उन्हें ग्राम गोरकापार की एक संत प्रवृत्ति की महिला महात्मा दाई सपने में उन्हें बड़ा व सोंहारी देते हुए बोली कि जन्माष्टमी पर तुम्हारी रिहाई हो जाएगी। इस घटना का रोचक पहलू यह है कि महात्मा दाई ने प्रत्यक्ष तौर पर यह बात गोरकापार गांव के लोगों को भी बताई थी कि पटवारी वली मुहम्मद जन्माष्टमी के दिन रिहा हो जाएंगे। वाकई ऐसा हुआ भी। जब अंग्रेजों की कैद से रिहा होकर वली मुहम्मद गोरकापार पहुंचे तो उनका खूब स्वागत हुआ। इसके बाद वली मुहम्मद ने महात्मा दाई से मुलाकात की और उनसे अपने सपने के बारे में बताया। इस पर महात्मा दाई ने कहा कि उन्हें सपने में आकर बापू ने कहा था। इसके बाद से आसपास गांव में मशहूर हो गया कि महात्मा दाई को स्वप्न में आकर महात्मा गांधी निर्देश देते हैं। धीरे-धीरे चर्चा बढ़ी तो फिर आस-पास के तमाम स्वतंत्रता सेनानी गोरकापार पहुंच कर महात्मा दाई और वली मुहम्मद से निर्देश लेने लगे। इसके बाद से इस गांव का नाम गांधी गोरकापार हो गया। स्वतंत्रता सेनानी वली मुहम्मद ने बाद के दिनों में डौंडी लोहारा को अपना कर्मक्षेत्र चुना। दस्तावेजों के मुताबिक डौण्डीलोहारा जमींदारी में उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के लिए लोगों को एकजुट किया और लगभग 100 लोगों ने उनके साथ जेल यात्रा की थी। उनके प्रमुख सहयोगी बालोद के स्व. सूरज प्रसाद वकील रहे है। वहीं कुटेरा के स्व. कृष्णाराम ठाकुर और भेड़ी गांव के रामदयाल ने उनसे प्रेरणा लेकर जंगल सत्याग्रह में भाग लिया था। 24 जुलाई 1957 को स्वतंत्रता सेनानी वली मुहम्मद का निधन हुआ।

स्वतंत्रता आंदोलन में रहे मुखर, कई बार की जेलयात्रा

वली मुहम्मद स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान बेहद मुखर रहे। उनके वंशजों के पास मौजूद दस्तावेज के मुताबिक अंग्रेजी राज के विरोध के चलते 7 मार्च 1923 को उन्हें गिरफ्तार कर नागपुर जेल भेज दिया गया। फिर वहां से उन्हें 23 जुलाई 1923 को अकोला नागपुर में स्थानांतरित कर दिया गया। इसी तरह 23 अक्टूबर 1939 से 14 नवंबर 1939 तक उन्हें रायपुर की केन्द्रीय जेल में रखा गया। अंतिम बार सन 1943 से 1945 तक पूरे दो साल तक उन्हें नागपुर जेल में कैद कर रखा गया। देश आजाद होने पर स्वतंत्रता आंदोलन में उनके इस विशिष्ट योगदान के लिए महाकौशल प्रांतीय कांग्रेस कमेटी जबलपुर के सभापति सेठ गोविंददास के हस्ताक्षर युक्त एक ताम्रपत्र 15 अगस्त 1947 को प्रदान किया गया। जो आज भी वली मुहम्मद के वंशजों के पास एक धरोहर के तौर पर रखा है।

शासकीय भवन, योजना अथवा नगर का नामकरण हो वली मुहम्मद के नाम पर

स्वतंत्रता सेनानी वली मुहम्मद के गुजरने के छह दशक बाद भी आज तक उनकी स्मृति को अक्षुण्ण बनाए रखने किसी तरह का ठोस प्रयास नहीं हुआ है। वर्ष 1997 में जब देश में स्वतंत्रता की 50 वीं वर्षगांठ मनाई गई तो उनका नाम अंकित शिलालेख डौंडी लोहारा में लगाया गया। उनके वंशजों में पौत्र और छत्तीसगढ़ शासन शिक्षा विभाग से रिटायर सहायक संचालक मुहम्मद अब्दुल रशीद खान बताते हैं कि डौंडी लोहारा में एक मुहल्ले का नाम वली मुहम्मद नगर रखने की पहल की गई थी लेकिन इस पर अब तक सरकारी मुहर नहीं लग पाई है। वहीं लोहारा के स्कूल का भी नामकरण वली मुहम्मद के नाम पर करने की मांग लंबे समय से रही है। उन्होंने राज्य सरकार से अपेक्षा की है कि शासन अपनी संवेदना का परिचय देते हुए स्व. वली मुहम्मद की स्मृति में किसी शासकीय भवन, योजना अथवा नगर का नामकरण करेगा। यही बापू के इस अनुयायी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। 

गुंडरदेही के गांधी गोरकापार से लेकर डौंडी लोहारा तक मौजूद है इस स्वतंत्रता सेनानी की गाथा, अब तक ठोस पहल नहीं हुई स्वतंत्रता सेनानी वली मुहम्मद की स्मृति को अक्षुण्ण बनाए रखने की

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