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रामलीला पर कोरोना संक्रमण का ग्रहण, तैयारी छोड़ खेती-किसानी में जुटा ‘रावण’

रामलीला पर कोरोना संक्रमण का ग्रहण, तैयारी छोड़ खेती-किसानी में जुटा ‘रावण’

रायपुर. नवरात्रि पर्व पर हर साल होने वाली रामलीला की रौनक इस बार देखने को नहीं मिलेगी। कोरोनाकाल में सार्वजनिक आयोजनों पर रोक लगी हुई है। दशहरा भी सादगी से मनाने कहा गया है। पूर्व में दूधाधारी मंदिर, शहीद स्मारक भवन समेत ग्रामीण क्षेत्रों में रामलीला का मंचन होता रहा है। दूधाधारी मंदिर में 20 सालों से लक्ष्मीनारायण मंदिर रामकुंड रामलीला पार्टी रामायण का मंचन कर रही है।

नौ दिन रामलीला चलने के बाद दशहरे के दिन रावणभाठा में अंतिम मंचन होता है। इस बार ऐसा कुछ नहीं होगा। दूधाधारी मंदिर के पुजारी हितेश दुबे ने बताया, संक्रमण के कारण इस बार मंडली को आमंत्रित नहीं किया है। 20 सालों में ऐसा पहली बार होगा, जब नवरात्रि में रामलीला नहीं होगी। प्रशासन ने इस आयोजन को लेकर कोई निर्देश नहीं दिया है, इसलिए आयोजन नहीं किया जा रहा है। दशहरा भी तय नियमों के अनुसार मनाया जाएगा।

युवाओं को देते थे मौका

देवपुरी स्थित गांधी चौक में श्रीराम रामलीला मंडली द्वारा 1972 से रामलीला का मंचन किया जा रहा है। संस्था प्रमुख लखन साहू ने बताया, नवरात्रि में रात को रामलीला के लिए किसी भी समिति या संगठन ने नहीं बुलाया गया है। जब मंडली की शुरुआत हुई थी, उस समय 40 से 45 पार्टियां मौजूद थीं। आज के दौर में उनका कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं बचा है। हर साल रामलीला के माध्यम से उन युवाओं को तैयार करते थे, जो अभिनय के क्षेत्र में बेहतर करना चाहते हैं। उन्हें उचित पैसे भी मिल जाते थे। बड़ी संख्या में युवा मंडली में अभिनय करने के लिए आते हैं। इसमें हर साल बेहतर करने वालों को लेते हैं। मंडली में कुछ सदस्य शुरुआत के दिनों से जुड़े हुए हैं। रामीलीला नहीं होने के कारण छोटे बच्चों और अभिनय करने वाले युवाओं को अगले साल तक इंतजार करना होगा। 

आमदनी का यही साधन : लक्ष्मीनारायण मंदिर रामकुंड रामलीला पार्टी में 1976 से रावण का किरदार निभा रहे बेमेतरा के चिंतामणि चौहान का कहना है, कोरोनाकाल में 7 महीनों से कोई काम नहीं मिला। खेती-किसानी करने के बाद केवल मंडली में अभिनय का काम करता हूं। इससे मिले पैसों से गुजारा चलता है। सामान्य दिनों में गांव में रामायण कथा व अन्य धार्मिक आयोजन में अभिनय का काम मिल जाता था। रामलीला में रावण बनने का हर साल मुझे इंतजार रहता है। इस बार दूधाधारी मंदिर समेत अन्य जगहों से कोई बुलावा नहीं आया है। मंचन पुरानी संस्कृति को बनाए रखने और आज की युवा पीढ़ी को रामायण से जोड़ने के लिए करते हैं। रावण की शक्ल बनाने के लिए 20 सालों से अपनी दाढ़ी नहीं कटवाई। इस साल बच्चे जितना रामलीला काे याद करेंगे, उतना ही हम अपने काम को। संक्रमण की वजह से लंबे समय तक रावण या कुंभकरण का किरदार नहीं निभाया।

नवरात्रि पर्व पर हर साल होने वाली रामलीला की रौनक इस बार देखने को नहीं मिलेगी। कोरोनाकाल में सार्वजनिक आयोजनों पर रोक लगी हुई है। दशहरा भी सादगी से मनाने कहा गया है। पूर्व में दूधाधारी मंदिर, शहीद स्मारक भवन समेत ग्रामीण क्षेत्रों में रामलीला का मंचन होता रहा है। दूधाधारी मंदिर में 20 सालों से लक्ष्मीनारायण मंदिर रामकुंड रामलीला पार्टी रामायण का मंचन कर रही है।

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