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रिंग में बॉक्सर तो बाहर माता-पिता बहा रहे पसीना

रिंग में बॉक्सर तो बाहर माता-पिता बहा रहे पसीना

झज्जर :  ब्रेक में अपने बेटे को जूस की बोतल देते हुए एक मां व रिंग में अभ्यास करवाते हुए कोच हितेश देशवाल।

झज्जर :  ब्रेक में अपने बेटे को जूस की बोतल देते हुए एक मां व रिंग में अभ्यास करवाते हुए कोच हितेश देशवाल।

तपस्वी शर्मा :  झज्जर

बॉक्सिंग के प्रति झज्जर क्षेत्र के युवाओं के साथ-साथ अभिभावकों का जुनून बढ़ता ही जा रहा है। शहर के जहांआरा बाग स्टेडियम में सुबह और शाम चार-चार घंटे जहां खिलाड़ी रिंग के अंदर और मैदान में पसीना बहा रहे है। वहीं अभिभावक भी शीत लहर के बीच खुले आसमान के नीचे अपने बच्चों का हौसला बढ़ाने के लिए बैठे रहते है।

अपने बच्चों को अंतरराष्ट्रीय बॉक्सर बनाने की चाह में जहां माता-पिता अपना पूरा समय निकाल रहे है, वहीं डाइट का भी विशेष ध्यान रख रहे है। अभ्यास के दौरान जब कोच द्वारा फाइट करवाई जाती है तो माता-पिता दूध, फल, जूस सहित अन्य स्वास्थ्यवर्द्धक पदार्थ अपने बच्चों को बीच-बीच में देते रहते है। जिसको देखकर एक अलग सी अनुभूति अंदर से महसूस होती है कि माता-पिता के लिए अपनी औलाद से बढ़कर कोई खुशी नहीं होती हैं।

कोच हितेश देशवाल का कोई सानी नहीं : दिनभर आठ से दस घंटे छोटे से लेकर बड़े खिलाड़ियों को अभ्यास करवा रहे कोच हितेश देशवाल के जुनून का भी कोई सानी नहीं है। चेहरे पर हमेशा मुस्कान और खिलाड़ियों को अपने बच्चों की तरह प्यार करते हुए उच्चकोटि का बॉक्सर बनाने में कोई कसर बाकि नहीं छोड़ रहे है। जिसके सुखद परिणाम भी सामने आने लगे है। कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी जिले, राज्य व देश का नाम रोशन कर चुके है। यहां से प्रतिवर्ष चार से पांच खिलाड़ी राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रहे है।

छोटे बड़े सभी खिलाड़ियों पर एक साथ नजर : स्वभाव से नम्र और मिलनसार कोच हितेश देशवाल की एक खास बात यह भी है कि अभ्यास के दौरान कोताई और अनुशासनहीनता कतई बर्दाश्त नहीं करते। वहीं सभी आयु वर्ग के खिलाड़ियों पर भी एक साथ नजर जमाए रहते है कि कौन क्या कर रहा है। बकौल हितेश देशवाल ये सभी खिलाड़ी मेरे चीते बेटे है, जब इनका पंच पड़ता है तो कोई प्रतिद्वंदी ठीक नहीं पाता। मेरा जीवन तो इन्हीं खिलाड़ियों के लिए हैं। अधिक से अधिक खिलाड़ी मेडल जीतकर लाए मेरे लिए सबसे बड़ी खुशी यहीं है।

अभिभावक करते है घंटों इंतजार : अपने बेटे विवेक साथ जहांआरा बाग स्टेडियम पहुंची महिला मुकेश ने बताया कि सभी माता-पिता का एक ही लक्ष्य होता है कि उनकी संतान जीवन में सफल इंसान बने। बेटे की रूचि बॉक्सिंग में है तो हम भी पूरा सहयोग कर रहे है। घरेलू काम का क्या है, वह तो टाइम की एडजेस्टमेंट के साथ हमने ही करना है, अगर बच्चा कामयाब हो जाता है तो इससे बढ़कर खुशी कोई नहीं है। वहीं अपनी बेटी कुसुम के साथ पहुंची महिला मिनाक्षी का कहना है कि अगर माता-पिता बच्चों के साथ आते है तो उनका हौंसला और अधिक बढ़ जाता है। इसलिए बच्चों के भविष्य को देखते हुए सुबह-शाम समय निकाल कर बेटी के साथ जरूर आती हूं। वहीं अन्य अभिभावक चुन्नी लाल, राकेश चाहार सहित काफी संख्या में अभिभावक रिंग के बाहर बच्चों का हौसला अफजाई करते है।

बॉक्सिंग सीखने पहुंचे छोटे बच्चों का कोच के प्रति है ज्यादा लगाव : कहते हैं छोटे बच्चे कच्चे घड़े के समान होते है, उन्हें जैसा ढाला जाए वैसे ही ढल जाते है। यह बात भी यहां मैदान में देखने को मिल रही है। कोच हितेश देशवाल छोटे बच्चों को खेल खेल में ऐसा सीखाते है कि बच्चों में भी जुनून पैदा हो जाता है। छोटे बच्चों को स्ट्रेचिंग से लेकर दौड़ लगवाना,यहां तक कि ग्लबस पहनाना, बैंडेज बांधना भी स्वयं सिखाते है। जिसके चलते छोटे बच्चे प्रतिदिन मैदान में आने की अपने अभिभावकों से जिद्द करते है।

झज्जर शहर के जहांआरा बाग स्टेडियम में सुबह और शाम चार-चार घंटे जहां खिलाड़ी रिंग के अंदर और मैदान में पसीना बहा रहे है। वहीं अभिभावक भी शीत लहर के बीच खुले आसमान के नीचे अपने बच्चों का हौसला बढ़ाने के लिए बैठे रहते है।

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