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सूरत टेक्सटाइल इंडस्ट्री में कोरोना की सर्वाधिक मार कपड़ा व्यापारियों पर पड़ी है

दीपावली को अब महीना भर की देरी है। सूरत शहर में कारोबार मंद गति से ही सही रफ्तार पकड़ रहा है। कोविड पहले के स्तर पर तो व्यवसाय नहीं पहुंचा है, लेकिन कारोबारी यह मान चुके हैं कि इस साल 50 प्रतिशत भी धंधा हो जाए तो बड़ी उपलब्धि होगी।

प्रवासी श्रमिक लौटे

सूरत में व्यवसाय-रोजगार की ऋढ़ की हड्डी माने जाने वाले टेक्सटाइल इंडस्ट्री की बात करें तो उत्पादन क्षेत्र में चहल पहल अच्छी है। प्रवासी श्रमिकों के लौट आने के औद्यागिक इकाइयों में स्थिति बड़ी तेजी से सुलझ रही है। लेकिन कहना होगा कि सूरत टेक्सटाइल इंडस्ट्री में कोरोना की सर्वाधिक मार कपड़ा व्यापारियों को पड़ी है।

30% दुकानें अब भी खुलनी शेष

जानकारों का कहना है कि सूरत के टेक्सटाइल मार्केटों में अब भी लगभग 30 प्रतिशत दुकानें कोरोना महामारी के चलते लागू लॉकडाउन के बाद से खुली ही नहीं हैं।

सूरत के कपड़ा व्यापारियों की प्रतिनिधि संस्था फोस्टा के अग्रणियों की मानें तो कोविड के पहले जहां सूरत में कपड़ा व्यापारियों का एक दिन का औसत कारोबार सौ करोड़ से अधिक का हुआ करता था, वो अब केवल 40 करोड़ के आसपास रह गया है।

सूरत के 180 के लगभग टेक्सटाइल मार्केटों में हालात ये हैं कि काफी दुकानें अब भी बंद पड़ी हुई हैं। इन बंद दुकानों के दो कारण हैं। एक तो महामारी के कारण वतन गये व्यापारियों का न लौटना। दूसरा सबसे बड़ा कारण है कारोबारियों द्वारा खर्चों में कटौती।

किराये की कम दुकानों से काम चला रहे व्यापारी

जानकार मानते हैं कि पहले ऐसे कारोबारियों की संख्या बड़ी थी जो एक से अधिक मार्केटों में, या एक ही मार्केटों में एक से अधिक दुकानें किराये पर रखकर कारोबार करते थे। कई ऐसे दुकानदार थे जिन्होंने एक से अधिक दुकानें किराये पर लेकर उन दुकानों का गोदाम के रूप में उपयोग करते थे। लेकिन अब सभी ने अपनी अतिरिक्त कैपेसिटी सरेंडर कर दी है। लोग कम से कम दुकानों में काम चला रहे हैं। इस कारण भी बड़ी संख्या में दुकानें बंद दिख रही हैं।

व्यापारियों का कहना है कि धंधा और मुनाफा इतना रह ही नहीं गया कि एक से अधिक दुकान का किराया चुकाया जा सके। वहीं किराये की दुकानों पर अपना जीवन-यापन करने वाले कारोबारियों को भी प्रतिकुलता का सामना करना पड़ रहा है। एक महाशय जिनकी मार्केटों में कई दुकानें किराये पर लगी हुई रहती थीं, कहते हैं कि जीवन में ऐसा समय कभी नहीं देखा कि टेक्सटाइल मार्केटों में दुकानें भरसक कोशिशों के बाद भी किराये पर नहीं चढ़ रही। किराया कम ऑफर करने पर भी व्यापारी किसी तरह का रिस्क न लेते हुए वेइन एंड वॉच की नीति अपनाये हुए हैं।

सूरत के कपड़ा कारोबार से जुड़े कई व्यापारियों ने अपना व्यवसाय तक बदल लिया है। कइयों ने सूरत छोड़ने तक का मन बना लिया है। ऐसे में कहा जा सकता है कि टेक्सटाइल औद्योगिक इकाइयों में कारोबार की स्थिति टेक्सटाइल मार्केटों में तुलना में बेहतर है। खैर, सभी उम्मीद लगाये हुए हैं कि दीपावली तक स्थिति में और सुधार हो और गुजरात की आर्थिक राजधानी माने जाने वाले सूरत में सबकुछ नोर्मल हो जाए।

दीपावली को अब महीना भर की देरी है। सूरत शहर में कारोबार मंद गति से ही सही रफ्तार पकड़ रहा है। कोविड पहले के स्तर पर तो व्यवसाय नहीं पहुंचा है, लेकिन कारोबारी यह मान चुके हैं कि इस साल 50 प्रतिशत भी धंधा हो जाए तो बड़ी उपलब्धि होगी। प्रवासी श्रमिक लौटे सूरत में

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